प्रदेश के कई जिलों में इन दिनों हर गली मुहल्ले में स्कूलों में दाखिलों का दौर चलू हो गया है। हर तरह के अच्छे स्कूलों में प्रवेश को लेकर मारामारी है। इनमें अग्रेजी माध्यम से शिक्षा की स्कूल भी शामिल हैं। बीते कुछ समय से अभिभावकों को सी बी एस सी पाठ्य क्रम वाली स्कूलों में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए खासी इच्छा बलवती बनी हुई है वे काफी भाग दौड़ कर अपने बच्चों को सेन्टर स्कूल सहित जवाहर नवोदय विद्यालय, सैनिक स्कूल मे दाखिल कराना चाह रहे है जव इसमे कामयावी नही मिलती तो गली कूंचे मे संचालित हो रही स्कूलों के संचालको के प्रलोभन कारी प्रचारों के शिकार हो जाते है इतना ही नहीं उन्हें फीस के एवज में एक बड़ी रकम भी खर्च करनी पड़ती है। इसके बाद भी अच्छी शिक्षा से बंचित हो जाते है।

बता दें कि शहरी इलाकों के साथ-साथ किस तरह ग्रामीण इलाकों में भी अग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाली स्कूलों को खोलने की होड़ मची हुई है। इस होड़ ने एक ऐसा माहौल बना दिया है कि बच्चों को श्वले ग्रुप, नर्सरी, केजी आदि भेजना आवश्यक सा हो गया है। एक समय कच्चे एक-पक्के एक वाली व्यवस्था ने अब अनावश्यक विस्तार ले लिया है।

जानकारों की माने तो सरकारी शिक्षा धीरे-धीरे निजी स्कूलों की ओर खिसक रही है। बीते शिक्षा सत्र में जिले के ज्यादा तर सरकारी स्कूलों को छोड़कर प्राइवेट स्कूलों में चले गए निजी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या में 50 से 60 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। यदि निजी स्कूलों में नामांकन की यही रफ्तार बनी रही तो 2020 तक नामांकन की यह दर 75 फीसदी तक पहुंच जाएगी। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के प्राथमिक सरकारी स्कूल केवल गरीब एवं पिछड़े परिवारों के बच्चों तक सीमित होकर रह गए हैं। इन विद्यालयों का शैक्षिक वातावरण शून्य हो गया है और शिक्षक शिक्षण कार्य के अलावा अन्य सभी काम करते दिखते हैं। सरकारी प्राथमिक शिक्षा के कमजोर तंत्र का फायदा निजी स्कूल उठा रहे हैं। यही वजह है कि प्राथमिक शिक्षा में अंग्रेजी शिक्षण संस्थाओं की बाढ़ सी आ गई है और अनेक उद्यमी रातोरात शिक्षाविद् कहलाने लगे हैं। अंग्रेजी स्कूलों की खासियत यह है कि वे औपचारिक शिक्षा की किताबी पढ़ाई शुरू होने से पूर्व अनौपचारिक शिक्षा पर आधारित हैं।

जबकि सरकारी स्कूल पढ़ाई के स्तर को देखें तो ज्ञात होता है कि बच्चे की अनौपचारिक पढ़ाई की खाना पूर्ती मात्र की जाती है वही अंग्रेजी शिक्षा का इतिहास बताता है कि इस शिक्षा का सिलसिला 18वीं शताब्दी में औद्योगिक व्यवस्था के चलते कायम हुआ। ऐसे माता-पिता, जो प्राईवेट नौकरी पेशा में कार्यरत थे उनके परिवार बिलकुल एकल थे। ऐसे परिवारों के बच्चों के लिए पालन-पोषण और प्राथमिक शिक्षा का कोई उचित प्रबंध नहीं था। इस प्रकार के परिवारों के बच्चों के शारीरिक विकास और मानसिक विकास के लिए सरकारी तौर पर प्री स्कूलों का प्रबंध किया गया था ताकि कार्यशील एकल परिवारों के बच्चों को इन स्कूलों में परिवार जैसा माहौल मिल सके और कामगार बच्चों की तरफ से निश्चिंत होकर अपना कार्य कर सकें। आज यह शानो सौकत की शिक्षा बन कर रह गई है आज के बच्चों मे सामाजीकरण करने और उन्हें दुनियावी जिंदगी से रूबरू कराने वाला कोई बचा ही नहीं।

इस सामाजिक और शैक्षिक टूटन का फायदा आवासीय स्कूल निजी स्कूल अग्रेजी की कथित पढ़ाई वाली स्कूल ने शिक्षा ने खूब उठाया। पश्चिम देशों की तरह भारत में भी यह प्री स्कूली शिक्षा फल-फूल रही है।

शहरों मे है आवासीय शिक्षा का जोर

शहरों में ऐसे एकल परिवार तेजी से बढ़े हैं, जिसमें पति-पत्नी, दोनों नौकरी करते हैं। ऐसे दंपती अकेले रहते हैं, इसलिए बच्चों को आवासीय स्कूली शिक्षा के हवाले करना बेहतर समझते हैं। चूंकि शहरों में यह एक चलन बन गया है कि बच्चों को औपचारिक शिक्षा से पहले अनौपचारिक शिक्षा दिलानी है, इसलिए संयुक्त परिवारों में रह रहे दंपती बच्चों को प्री स्कूलों में भेजते हैं। इसके बदले उन्हें अच्छी-खासी फीस चुकानी पड़ती है। विडंबना यह है कि कोई भी इस पर सोचने-विचारने के लिए तैयार नहीं कि आखिर बच्चों को कक्षा एक में दाखिला लेने यानी औपचारिक शिक्षा के पहले प्री स्कूल जाना क्यों आवश्यक है और वह भी सालों-साल किसी को यह समझ आना चाहिए कि यह सही नहीं कि बच्चों को औपचारिक शिक्षा दिलाने के पहले उन्हें इतना अधिक तैयार करने की जरूरत पड़े। कायदे से तो नर्सरी के बाद बच्चों को सीधे कक्षा एक जाना चाहिए।

थोड़ी सी सीख की वसूलते है मोटी रकम

इन रिहायसी स्कूलों के फीस ढांचे का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि बच्चों का उठना बैठना, खाना-पीना और थोड़ी बहुत अंक गणना सिखाने की बड़ी कीमत वसूली जा रही है। राजस्थान जैसे राज्य में जहां अभी भी परिवार अव्यवस्था के दौर से गुजर रहे है आर्थिक कमजोरियों से जकड़ा हुआ है वही परिवार अपने हर जरूरतों मे कटौती करके अपने बच्चों के शिक्षा के लिये महगे स्कूली शिक्षा जो एक उद्योग में तब्दील हो चुका है के शोषण के शिकार होने को विवश है यहां देखने में यह भी आ रहा है कि एकल कामकाजी परिवारों ने अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजना शुरू तो कर दिया है, लेकिन किसी भी प्रकार का निगरानी तंत्र न होने से उन्हें यह नहीं पता चलता कि बच्चे का कितना विकास हो रहा है? एक समस्या यह भी है कि स्कूल जाने वाले बच्चे समय से पहले मां-बाप के नैसर्गिक प्रेम से वंचित हो रहे हैं।

अबोध बालकों मे संवेदनशीलता होती है

पांच साल की उम्र बच्चों के विकास की सबसे संवेदनशीलता अधिक होती है। यह वह अवस्था होती है जब बच्चा परिवार और दुनियावी जिंदगी के बीच तालमेल बैठाता है। भले ही प्री स्कूली संस्थाएं कामकाजी परिवारों के लिए एक सहारा बन रही हों, लेकिन उनका अनिवार्य होते जाना कोई शुभ संकेत नहीं।

बुजुर्गों की पूर्ति करते है प्ले व बचपन स्कूलें

आम लोगों मे बढ़ती शिक्षा के प्रति लगाव ने नर्सरी बचपन व प्री स्कूली शिक्षा की ओर आकर्षित किया है इसकी कितनी आवश्यक है? कम से कम यह तो आवश्यक नहीं होना चाहिए कि बच्चा औपचारिक शिक्षा हासिल करने जाने के पहले कई साल तक अपने माता-पिता का दुलार पाने के बजाय स्कूलों में गुजारे और इसके बदले अभिभावक भारी-भरकम फीस खर्च करनें मे पीछे नही रहते है। वर्तमान समय में जो कार्य आजकल आवासीय स्कूल कर रहे हैं, वह एक समय घर के बड़े-बुजुर्ग किया करते थे। किन्तु इन दिनों हर परिवार मे एकल परिवारों होने के चलते अब ऐसा होना थोड़ा कठिन है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि स्कूली शिक्षा के ढांचे पर कोई ध्यान न दे।

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