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मैकॉले को कोसने से कुछ नहीं होगा …आत्मवंचना कीजिये

” मैकॉले को कोसने से कुछ नहीं होगा …आत्मवंचना कीजिये …गुजरे 1000 सालों में हिन्दू राजाओं ने या मुग़ल बादशाहों ने अपनी प्रजा के लिए किया ही क्या था ?

…हिन्दू राजाओं /मुग़ल बादशाहों ने कभी अपने लिए या अपनी प्रजा के लिए कोई लिपिबद्ध आचार संहिता बनायी ? — नहीं . कोई शिक्षानीति बनायी ? — नहीं . कोई सर्व शिक्षा अभियान चलाया ? — नहीं . कोई जनस्वास्थ्य की बात की ? — नहीं .कभी किसी देश की कल्पना की ? — नहीं . कभी राष्ट्र की कल्पना की ? — नहीं ? अपने राज्य के लिए कभी कोई संविधान बनाया ? — नहीं ….

केवल असमर्थों पर अत्याचार करते रहे …लूटते रहे …लडकियाँ उठाते रहे …लुटेरों की तरह लूटते रहे ….डकैत गिरोहों की तरह लूटते रहे …भारी पड़े तो लूट लिया , दूसरों की जर/जोरू /जमीन पर कब्ज़ा कर लिया और कोई भारी पड़ा तो भाग लिए …अपनी सत्ता को स्थाइत्व देने के लिए जनता को कुछ राहत तो देनी पड़ती है …हिन्दू राजाओं की चरित्रहीनता से ऊबी जनता को मुग़ल बादशाहों ने थोड़ी राहत दे कर लूटा …क्या बात थी कि कर्मवती को पूरे भारत में कोई भाई चरित्र नहीं दिखा और हुमायूं भारत में राखी के बहाने आ डटा ? …मुगलों ने भारत में भरपूर अत्याचार किये पर आम जनता को कुछ नागरिक सुविधाएं भी दीं …न्याय के लिए नियमित अदालतों की व्यवस्था हुयी …वकील,मुंसिफ ,मुद्दई ,मुलजिम ,जिरह,बहस ,जमानत , गिरफ्तार , फैसला आदि सारे उर्दू के शब्द हैं . इनका एक भी प्रचलित हिन्दी /संस्कृत/ बंगाली / कन्नड़ /तमिल /तेलगू /उड़िया में शब्द नहीं है . चूंकि मुगलों के पहले व्यवस्था ही नहीं थी तो शब्द कहाँ से होता ? …सोशियल पुलिसिंग चालू हुयी कोतवाल , दरोगा , हवलदार ,दीवान ,मुन्सी ,बयान और पुलिसिया रोज नामचों में दर्ज होने वाले तमाम तकनीकी शब्द उर्दू के हैं , अरबी के हैं पर भारतीय भाषाओं के नहीं .– क्यों ? …

क्योंकि नागरिकों को पुलिस व्यवस्था देने के लिए भारतीय मूल के राजाओं ने सोचा ही नहीं . मुगलों ने सड़कें बनवाईं , पुल बनवाये …अदालतें बनवाईं …जन स्वास्थ्य के लिए सफाखाने (अस्पताल ) बनवाये …भारतीय जनता खुश हुयी होगी …एक लुटेरे को खदेड़ कर दूसरा लुटेरा आया था पर वह उसे ही तो लूट रहा था जिस पर कुछ था …लुटी पिटी जनता को अब कुछ जन सुविधाएं भी थी … जन विश्वास खो चुके और पूर्ण शोषक हो चुके क्षत्रीय राजाओं की मूंछें और उनके मंत्री पण्डित जी की शिखा और यज्ञोपवीत मुगलों ने बेरहमी से नोच ली थी …अब लुटेरे बन कर आये मुगलों ने लूट कर भागने के बजाय यहीं पैर जमा लिए …सत्ता जमाते हुए उन्होंने सरकार को स्वरुप दिया …न्यायव्यवस्था कायम हुयी …स्वास्थ सेवायें शुरू हुईं …पुलिस अस्थ्त्व में आयी …परिवहन के लिए सड़कें बनीं …जमीनों के नक़्शे बने …राज्य चलाने के लिए राजस्व वसूली की व्यवस्था हुयी …जमींदारी व्यवस्था ने पैर जमाये …मुगलों ने भारतीय मूल के राजाओं का सैनिक बन कर लड़ने वाले गरीब कुचले हुए विपन्न लोगों को पहली बार नागरिक सुविधाएं दीं . इससे मुगलों के विरुद्ध भारतीय मूल के राजाओं को सैनिक मिलना बंद हो गए …अब संपन्न की हिफाजत विपन्न ने करना बंद कर दी थी …क्षत्रीय राजाओं की शान और उनके पुरोहित बने पण्डितजीयों का ज्ञान मुगलों का गुलाम बन चुका था

….फिर पैर स्थाई जमते ही मुग़ल लुटेरे बादशाह बन बैठे और उन्होंने भी क्रूरता से शोषण जारी किया तो अंग्रेज आये . अंग्रेजों ने व्यापार का कल्याणकारी मुखौटा लगाया और वार किया …अंग्रेज सत्ता की स्थापना के बाद अंग्रेजों ने भारतीय मूल के शेष या यों कहें कि अवशेष राजाओं की मूंछें , पंडितों की मुगलों से शेष बची शिखा तो उखाड़ ही ली साथ ही मुग़ल बादशाहों की और उनके साथी मुल्लों की दाढ़ी भी उखाड़ ली …ठाकुर साहब की मूंछें , पंडितों की शिखा और मुगलों की दाढी अब अंग्रेजों के दरबार में कालीन बन कर बिछी थी …पददलित …भारतीय मूल के या मुग़ल राजाओं ने स्कूल नहीं खोले थे …दूर दराज के आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनरी स्कूल खोले गए … झाबुआ, बस्तर, जगदलपुर जैसी जगह अंगरेजी स्कूल और अस्पताल खुलने लगे …गरीबों के बच्चे साक्षर हो रहे थे माध्यम वर्ग के बच्चे समझदार और उच्च वर्ग के बच्चे शिक्षित …न्याय और प्रशासन की भाषा अंगरेजी हो चली …सड़कें बनी …आज के न्यायालयों /विधान सभाओं /संसद /विश्वविद्यालयों की इमारतें अंग्रेजों की बनवाई हैं …रेलवे अंग्रेजों की बनवाई है ….हम तो अंग्रेजों की बनायी व्यवस्था पर अंग्रेजों को खदेड़ कर बस बैठ गए हैं …न हमने व्यवस्था बनायी है न क़ानून …

लगभग 2800 केन्द्रीय कानूनों ( Central Act ) में 2635 अंग्रेजों के बनाए हुए हैं … आज भी आपके स्कूलों से ईसाई स्कूलों की फीस कम और स्तर बहुत अच्छा है… क्यों ? …मिशनरी स्कूल के प्रिंसपल का बच्चा मिशनरी स्कूल में पढता है पर सरकारी स्कूल में सरकारी कर्मचारियों के बच्चों का पढना अनिवार्य नहीं है …भारत में चन्द्रगुप्त -चाणक्य ने जन सुविधाओं / न्याय की निश्चितता / लिखित क़ानून / जन शिक्षा के अभिनव प्रयोग किये थे पर बिन्दुसार का अतिसार उन्हें ले बीता …आपने जब कुछ दिया ही नहीं और मैकोले ने उस शून्य को भरा तब आप मेकॉले को कोस कर क्या कहना चाहते हैं ? ….मेकॉले ने तुम्हारी व्यवस्था …तुम्हारी न्यायपालिका , तुम्हारे क़ानून , तुम्हारी अदालतें हटा कर अपनी नहीं दी …मैकॉले ने तुम्हारे स्कूल हटा कर अपनी शिक्षा पद्धति नहीं दी …मैकॉले ने तुम्हारी दंड सहित /साक्ष्य अधिनियम /प्रक्रिया संहिता हटा कर अपनी नहीं स्थापित की मैकॉले ने तो जब कोइ व्यवस्था ही नहीं थी तब एक व्यवस्था की नीव डाली जिस पर आपने अपने आधुनिक भारत की इमारत बुलंद की हैं …मैकॉले आपकी निरंतर बुलंद होती भारत की इमारत का नींव का पत्थर है …नालायक संतानों की पहचान होती है कि वह खुद कुछ नहीं करते और कुछ करने वाले को पुरजोर कोसते हैं … हम भारतीय मूल के लोगों ने या काबुल कंधार से आये मुगलों ने किया ही क्या है ? …. अव्यवस्था में मेकॉले व्यवस्था स्थापित कर गया …हम पर आज भी मेकॉले से बेहतर कोई अन्य वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है ….ऐसे में हम अपने पुरखों की अकर्मण्यता को कोसें इससे बेहतर है मैकॉले को धन्यवाद दें .”

– राजीव चतुर्वेदी

लेखक के निजी विचार हैं, उन्‍हीं के ब्‍लॉग से साभार

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