Bank Exam Career in Bank Job Career in Private Banks v/s Public Sector Banks

कोंचिंग की तुलना में घर पर बैंक परीक्षा की तैयारी श्रेष्‍ठ क्‍यों है? Why Bank Exams Preparation at home is better than Coaching Institutes

काउंसलर के पास परीक्षा की तैयारी के बारे में पूछने आए अधिकांश छात्रों का यह प्रमुख सवाल होता है कि हमें कौनसे कोचिंग इंस्‍टीट्यूट में तैयारी करनी चाहिए, ताकि सफलता की संभावना बढ़ जाए। हकीकत इससे जुदा है, कोचिंग की तुलना में घर पर की गई तैयारी में बैंक परीक्षा (Bank Exams) में सफल होने की संभावना कहीं अधिक है। आइए जानते हैं क्‍या है इसका कारण…

शॉर्टकट तकनीकें

कोई भी ढंग का कोचिंग इंस्‍टीट्यूट अपने विद्यार्थियों को परीक्षा में काम में लिए जाने वाले शॉर्टकट तकनीकों के बारे में नहीं बताता है, इसका प्रमुख कारण तो यह है कि ये शॉर्टकट तकनीक परीक्षा में सफल होने की गारंटी नहीं देते हैं। ऐसे में अपने विद्यार्थियों को यह तकनीके सिखाकर कोई भी कोचिंग संस्‍थान अपनी साख पर बट्टा लगाने जैसा कदम नहीं उठाएगा। दूसरा बड़ा कारण है कि इन तकनीकों में अधिकांशत: तकनीकें बड़ी मजाकिया किस्‍म की होती हैं। अगर इंस्‍टीट्यूट में इन्‍हें पढ़ाया जाए तो मुश्किल से तैयार किया गया गंभीर माहौल इसकी भेंट चढ़ सकता है। कुछ स्‍टूडेंट्स ऐसे भी हैं जो क्‍वांटिटेटिव एप्‍टीट्यूड के सभी सवाल एलजेबरा इक्‍वेशन से हल कर सकते हैं तो कुछ दूसरे हर सवाल को पहले एक बारगी एस्‍टीमेशन estimation तकनीक से परख लेते हैं। इन छात्रों को IBPS की PO परीक्षा में सफल होते भी देखा गया है। कोचिंग कभी आपको ऐसी तकनीक के बारे में नहीं सिखाएगा।

घटिया शिक्षक

कोचिंग संस्‍थान कोई चैरिटी बिजनेस तो है नहीं, वे अपने संस्‍थान में ऐसे शिक्षकों को रखते है जिन्‍हें वे दो घंटे के लेक्‍चर के बदले 300 से 500 रुपए अधिकतम देते हैं। अगर कोई शिक्षक इतना सक्षम हो कि आपको पीओ की परीक्षा पास करवा सकने की कुव्‍वत रखता हो तो क्‍या वह 300 रुपए में दो घंटे लेक्‍चर देने को तैयार होगा या कम से कम 40 हजार रुपए तनख्‍वाह वाली पीओ की नौकरी के लिए परीक्षा पास करेगा। किसी शिक्षक का नाम बड़ा हो सकता है, लेकिन उससे पढ़कर पास होने की गारंटी कतई नहीं हो सकती। कई बार तो यह भी देखने में आया है कि कोचिंग में पढ़ा रहे शिक्षक की तुलना में कई विद्यार्थियों की अंग्रेजी और गणित में पकड़ कहीं बेहतर होती है।

घटिया पाठ्य सामग्री

कभी किसी कोचिंग अच्‍छे कोचिंग इंस्‍टीट्यूट का स्‍टडी मैटीरियल देखिए। पूरे क्‍वांटिटेटिव एप्‍टीट्यूड की पुस्‍तक के लिए 200 पेज का मैटीरियल देंगे। क्‍या हकीकत में क्‍यू ए के कोर्स के सभी सवालों को 200 पेज में समेटा जा सकता है? कभी नहीं। अगर कोई ईमानदारी से तैयारी कराए तो केवल डाटा इंटरप्रटेशन वर्कबुक में ही 200 पेज खप जाएंगे। क्‍यू ए के कोर्स को पूरा कराने में ही तीन महीने का वक्‍त लग जाएगा। जबकि कोचिंग इंस्‍टीट्यूट आपको दो महीने और 4000 हजार रुपए में पूरा कोर्स करवा देते हैं। यह कैसे संभव होता है? जबकि वास्‍तव में पूरा कोर्स कराया जाए तो कम से कम पांच महीने लगे और प्रत्‍येक छात्र से कम से कम 25 हजार फीस लग जाएगी, जो कोई देगा नहीं। लाभ कमाने के लिए खुले कोचिंग संस्‍थान अपना नुकसान कर तो विद्यार्थियों को पढ़ाएंगे नहीं, ऐसे में दो महीने में कोर्स निपटा दिया जाता है।

सरल प्रश्‍नपत्रों का जाल

अगर आप किसी कोचिंग संस्‍थान में जाकर तैयारी करते हैं तो पाएंगे कि वहां तैयारी बहुत आसान नजर आती है। केवल कोर्स ही नहीं, इंस्‍टीट्यूट द्वारा लिए जाने वाले प्रश्‍नपत्र भी इतने आसानी से हल होते हैं कि लगता है परीक्षा में सफल होना अधिक मुश्किल नहीं रहेगा। अब कमजोर शिक्षकों के साथ खड़ा इंस्‍टीट्यूट हर चैप्‍टर के आखिर में बीस सवाल देता है। आप उन बीस सवालों से आगे किसी सूरत में नहीं बढ़ सकते। लेकिन ध्‍यान रखें, परीक्षा कोचिंग के उन बीस सवालों पर आधारित नहीं होगी।

समूह में अभ्‍यास के लाभ

कोचिंग के बजाय निजी स्‍तर पर अभ्‍यास करें और इस अभ्‍यास को पूर्णता देने के लिए साथियों के साथ समूह बनाए जा सकते हैं। इससे अव्‍वल तो आप अपनी खुद की गति से पढ़ाई कर पाते हैं, स्‍टडी मैटीरियल के बारे में बेस्‍ट अपडेट रहते हैं, मॉडल पेपर और न्‍यूजपेपर पर अतिरिक्‍त समय जाया करने से बच जाते हैं और महत्‍वपूर्ण बात यह भी है कि पैसे बचते हैं जो अनर्गल कोचिंग में खर्च होने वाले थे।

कोचिंग की सफलता के राज

अगर आपको लगता है कि समाचारपत्रों में छपने वाले कोचिंग के सभी विद्यार्थी उसी कोचिंग संस्‍थान में पढ़े हुए हैं तो आप मुगालते में हैं। परीक्षा परिणाम आने के सा‍थ ही कोचिंग संस्‍थानों की एक दौड़ शुरू होती है। ये संस्‍थान सफल विद्यार्थियों से संपर्क करते हैं और पांच या दस हजार रुपए देकर उस छात्र से अपने संस्‍थान के लिए अखबार में विज्ञापन देने अथवा पैम्‍फलेट में छापने की अनुमति लेते हैं। ऐसे में नए विद्यार्थियों को अधिकांशत: मूर्ख बनाकर ही कोचिंग संस्‍थान अपना धंधा चलाते हैं।

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