शाला दर्पण : अब बाबूगिरी भी शिक्षकों के कंधे पर

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शाला दर्पण : अब बाबूगिरी भी शिक्षकों के कंधे पर

बीकानेर। शिक्षकों से राष्‍ट्र के जनभागीदारी वाले कामों को डालने के बाद अब शिक्षा विभाग के भीतर मंत्रालयिक कर्मचारियों का भार भी आने लगा है। शिक्षा विभाग के पूरे टीचर्स मैनेजमेंट सिस्‍टम को ऑनलाइन करने का प्रयास किया जा रहा है, इस क्रम में शाला दर्पण वेबसाइट पर स्‍कूलों से संबंधित सभी डाटा नियमित रूप से अपलोड किए जा रहे हैं, लेकिन अनेक संस्‍था प्रधानों ने यह काम स्‍कूल के मंत्रालयिक कर्मचारियों से करवाने के बजाय शिक्षकों से कराना सुभीता लग रहा है।

शाला दर्पण का शुरूआती काम अधिक कठिन था, सो कम्‍प्‍यूटर और ऑनलाइन विधियों के जानका‍र शिक्षकों ने भी आगे बढ़कर मदद कर दी। अब यही मदद शिक्षकों के गले की घंटी बन गई है। मंत्रालयिक कर्मचारियों ने इस काम से खुद का पल्‍ला झाड़ लिया है और गुरु पढ़ाने से ज्‍यादा ऑनलाइन फीडिंग पर केन्द्रित हो रहे हैं।

शाला दर्पण की ऑनलाइन फीडिंग का काम सतत चलने वाला काम है, ऐसे में शिक्षकों का नियमित शिक्षण कार्य इस अतिरिक्‍त बोझ से बाधित होने लगा है। ऐसे में विरोध के स्‍वर धीरे धीरे उठने शुरू हो गए हैं। एक तरफ शिक्षकों पर बेहतरीन परिणाम लाने का दबाव है तो दूसरी तरफ शिक्षण के इतर कार्यों का दबाव उनके मूल काम को प्रभावित कर रहा है।

फिलहाल शिक्षक संगठनों की ओर से इसके विरोध में कोई मांग या ज्ञापन प्रशासन को नहीं गया है, लेकिन ऑनलाइन सोशल साइट पर इसके विरोध के स्‍वर दिखाई देने शुरू हो गए हैं। ऐसा ही एक संदेश इस प्रकार है…

शिक्षक बंधुओं, आजकल यह देखने में आ रहा हैं कि कई विद्यालयों में संस्था-प्रधान विद्यालय में एल डी सी/यू डी सी के होते हुए भी शालादर्पण का काम शिक्षकों से करवा रहे हैं जो नियम विरुद्ध हैं। जिस काम में टीसी, कार्मिक सेवा अभिलेख, कार्मिक रिलीविंग, ज्‍वाइनिंग, पूरा परीक्षा अभिलेख, मिड-डे-मील रिकॉर्ड और  एसएमसी/एसडीएमसी का रिकॉर्ड संधारित करना सम्मिलित हो, उस काम की जिम्मेदारी भला एलडीसी/यूडीसी के होते हुए शिक्षक की कंधे पर कैसे डाली जा सकती हैं? शालादर्पण का काम नियमित  रूप से वर्ष पर्यन्त चलने वाला काम हैं। इसकी जिम्मेदारी शिक्षकों को देने से शिक्षण की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती हैं। विद्यालय में एलडीसी/यूडीसी का पद रिक्त होने की दशा में संस्था-प्रधान बाजार में मौजूद कंप्यूटर ऑपरेटर्स की सहायता लेवें, भामाशाहों की मदद से स्कूल में कंप्यूटर ऑपरेटर्स लगाये या अन्य किसी फण्ड से व्यवस्था करे। कुछ विद्यालयों में तो एल डी सी/यू डी सी के होते हुए भी कंप्यूटर ऑपरेटर्स की सहायता ली जा रही हैं जबकि कुछ विद्यालयों में इनके पद रिक्त होते हुए भी शिक्षकों को आदेशित कर उनसे से शालादर्पण के नाम पर बाबूगिरी करवाई जा रही हैं, जो शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के हित में नहीं हैं।सीधे-साधे शिक्षक इसे अपने जॉब-चार्ट का हिस्सा मानकर अपने मूल और वास्तविक कर्तव्य से भटक रहे हैं। संस्था प्रधान सोचते हैं कि किसी शिक्षक को कंप्यूटर का ज्ञान हैं तो इसका उपयोग कार्यालय कार्य हेतु होना चाहिए जबकि वास्तविकता यह हैं कि कंप्यूटर का ज्ञान शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया को सुगम, सरल,रोचक और प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक हैं। समस्त शिक्षक संघ विद्यार्थी हित में इस समस्या के खिलाफ आवाज उठाये। अगर सरकार और संस्था- प्रधान सुनवाई नहीं करे तो शिक्षक संघ  उच्च न्यायलय में जनहित याचिका लगाए।