पाठशाला में बदलावः राजस्थान में अब फेल भी होंगे बच्चे

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पाठशाला में बदलावः राजस्थान में अब फेल भी होंगे बच्चे

अगस्त महीने की 14 तारीख को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने जयपुर, राजस्थान में आयोजित एक शिक्षा महोत्सव में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी की तारीफों के खूब पुल बांधे और कहा कि वे राज्य की शिक्षा प्रणाली में वही बदलाव ला रहे हैं.

जो केंद्र दूसरी जगहों पर लागू कर रहा है. उन्होंने खास तौर पर जिक्र किया कि राजस्थान किस तरह पहला राज्य था जिसने स्कूलों में नो डिटेंशन नीति को खत्म किया. शिक्षा के अधिकार के तहत कक्षा 8 तक के विद्यार्थियों को बगैर परीक्षा पास किए अगली कक्षा में भेजने की इस नीति की वजह से शिक्षा के स्तर में गिरावट देखी जा रही थी.

राजस्थान से सीख लेते हुए केंद्र ने देवनानी की अगुआई में 28 राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की एक समिति बनाई. इनमें से 23 शिक्षा मंत्रियों ने कक्षा 5 से आगे परीक्षा की व्यवस्था दोबारा शुरू करने की सिफारिश की और यह भी कि परीक्षा में फेल होने वाले छात्रों को सुधार का एक और मौका दिया जाएगा, जिसमें शिक्षक उनकी मदद करेंगे. 3 अगस्त को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नो डिटेंशन (फेल न करने की) नीति को रद्द करने के लिए शिक्षा के अधिकार कानून में संशोधन को मंजूरी दे दी.

इससे राजस्थान के उन प्रयोगों ने देश भर का ध्यान खींचा जो राज्य के स्कूलों में शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए लागू किए जा रहे हैं. राजे ने अपने मंत्री और अफसरों से मांग की कि कक्षा छह के छात्र को अपनी यानी कक्षा छह के गणित के सवालों को हल करना इस तरह आना चाहिए कि वे किसी भी एजेंसी के किसी भी सर्वे में उन्हें करके दिखा सकें. यही बात जावडेकर ने भी दोहराई जब उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इसे देश के हर स्कूल में लागू करना चाहती है. दोनों ने यह भी कहा कि ऐसा माता-पिता, शिक्षकों, छात्रों, समुदाय और स्कूलों को एक साथ लाकर ही किया जा सकता है.

दिसंबर 2013 में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही राजे ने इस एजेंडे पर जोर देना शुरू कर दिया था. उन्होंने आरएसएस के पुराने तपे-तपाए नेता देवनानी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया, जो इंजीनियरिंग ग्रेजुएट हैं और इसलिए आधुनिक नजरिए के साथ-साथ राष्ट्रवाद का मेल कर सकते थे. उन्होंने देवनानी को प्रमुख शिक्षाशास्त्रियों की एक समिति दी, जिसमें स्टडी हॉल एजुकेशन फाउंडेशन की उर्वशी साहनी और वसंत वैली स्कूल के डायरेक्टर अरुण कपूर भी थे.

राजे ने 18 अगस्त को इंडिया टुडे  से कहा, ”हम सरकारी स्कूलों को चलाने के तौर-तरीकों का कायापलट कर देना चाहते थे.” इसके लिए उन्होंने सरकार के हाथों संचालित स्कूलों में अभिभावक-शिक्षक बैठकों की व्यवस्था लागू की, जो अभी तक निजी स्कूलों तक ही महदूद थी. वे बताती हैं, ”एक साल से भी कम वक्त में इन बैठकों में तीस लाख माता-पिता शरीक हो चुके हैं.” इन कोशिशों के फलस्वरूप दस लाख से ज्यादा छात्र निजी स्कूल छोड़कर सरकारी स्कूलों में आ गए हैं.

जावडेकर की तारीफ से उत्साहित देवनानी जनवरी 2017 में जारी 11वीं सालाना शिक्षा की स्थिति रिपोर्ट (ग्रामीण) 2016 (एएसईआर) और  साथ ही 2016 के स्टेट लर्निंग एचीवमेंट सर्वे का हवाला देते हैं. ये अध्ययन बताते हैं कि इन कोशिशों की बदौलत शिक्षा की हालत में थोड़ा सुधार आया है और कुछ मामलों में राज्य राष्ट्रीय औसत से आगे निकल गया है. शिक्षा का अधिकार लागू होने के बाद पहली बार सरकारी स्कूलों में नामांकन में इजाफा हुआ है जबकि निजी स्कूलों में नामांकन में गिरावट आई है.

देवनानी कहते हैं, ”मुख्यमंत्री चाहती थीं कि हम गैर-जरूरी स्कूलों में कटौती करके खर्चों को तर्कसंगत बनाएं.” लिहाजा, उन्होंने आंगनवाड़ी, प्राइमरी, सेकंडरी और सीनियर सेकंडरी सरीखे कई स्कूलों को आपस में मिलाकर एक कर दिया. स्कूल शिक्षा के प्रिंसिपल सेक्रेटरी नरेश गंगवार कहते हैं कि डिजिटल व्यवस्थाओं को सुचारू और सरल बना दिया गया है और राजकाज को सुधारा गया है. व्हाट्सऐप पर ग्रुपों और सब-ग्रुपों और वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए सरकारी फैसले पलक झपकते सब लोगों तक पहुंच जाते हैं और बड़े अफसर तथा मंत्री माउस के एक क्लिक पर हाजिरी देख सकते हैं.

साभार आज तक इंडिया टुडे


शिक्षा की स्थिति

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अधीन ‘नो डिटेन्शन’ नीति (अनुत्तीर्ण न करने की नीति) में संशोधन का निर्णय लिया है। यह देश में स्कूल छोडऩे वाले बच्चों की शिक्षा के निराशाजनक हालात में सुधार की दिशा में छोटा लेकिन अहम कदम है। सच तो यह है कि 24 राज्यों में संसदीय संशोधन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा की जा रही है ताकि अकादमिक वर्ष 2018 से स्कूली विद्यार्थियों की आकलन के आधार पर प्रोन्नति की जा सके। इससे यही संकेत मिलता है कि केंद्र सरकार इस हकीकत को समझ रही है कि 20 फीसदी से अधिक बच्चे कक्षा 9 में स्कूल छोड़ देते हैं और यह कहीं न कहीं व्यवस्था की गड़बड़ी है। मौजूदा कानून के तहत बच्चों को स्कूल में बने रहने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कक्षा 8 तक उनको स्वत: आगे बढऩे दिया जाता है। इस प्रावधान के आने के बाद जो कानून बनेगा उसके तहत राज्यों को यह अनुमति होगी कि वे कक्षा 5 और कक्षा 8 के बाद वर्षांत में छात्रों का आकलन कर सकें। ये वे वर्ष हैं जब बच्चे माध्यमिक शिक्षा लेते हैं। अगर बच्चे उस आकलन में अनुत्तीर्ण होते हैं तो राज्य के पास अधिकार होगा कि वह चाहे तो दो माह बाद बच्चों की दोबारा परीक्षा ले। जो बच्चे दो बार अनुत्तीर्ण हो जाएं उनको आगे रोका जा सकता है।

अगर ऐसा होता है तो कम से कम यह संभावना बनेगी कि राज्य प्रशासन स्कूलों और शिक्षकों पर दबाव बनाए कि वे अकादमिक रूप से पिछड़े बच्चों को बेहतर तैयारी कराएं। बहरहाल, यह तभी कारगर होगा जबकि शिक्षण मानकों में भी बेहतरी लाई जाए। एक के बाद एक  वेतन आयोग के आगमन और वेतन भत्तों में बेहतरी के बावजूद शिक्षण के मानक कमजोर बने हुए हैं। इस कमजोरी की वजह से हमारा देश बहुचर्चित जननांकीय लाभांश का लाभ नहीं उठा पा रहा है। जबकि नीति निर्माता भविष्य को लेकर जब भी कोई बात करते हैं तो उसमें जननांकीय लाभांश का उल्लेख शामिल रहता है। इसमें दो राय नहीं कि देश के अधिकांश बच्चों को शिक्षण के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं मिल पाती। ऐसे में साल के अंत में होने वाली परीक्षा में बड़ी तादाद में बच्चे अनुत्तीर्ण भी हो सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो अधिनियम का उद्देश्य विफल रहेगा।

प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की 2016 की सालाना शिक्षा संबंधी रिपोर्ट बहुत निराशाजनक तस्वीर पेश करती है। स्कूलों में नामांकन सुधरने के बावजूद शौचालय, पक्के भवन और अन्य सुविधाओं के मामले में, लैंगिक अंतर, गणित और पढऩे के कौशल, देश के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा के स्तर आदि के मामले में हम पीछे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कक्षा 5 के बच्चों में पढऩे का स्तर वर्ष 2011 और 2016 के बीच जस का तस रहा। कक्षा 8 के छात्रों के लिए इस मानक में इस अवधि में कमी आई। सामान्य गणितीय कौशल में कक्षा 5 के बच्चे बहुत खराब स्थिति में हैं जबकि हमारा देश सूचना प्रौद्योगिकी जगत की ताकत होने का दम भरता है। बमुश्किल एक चौथाई बच्चे सामान्य गुणा-भाग कर सके। कक्षा 8 के बच्चों में यह अनुपात बेहद खराब हुआ। सन 2010 में जहां 68.4 फीसदी बच्चे ऐसा कर पाते थे वहीं 2016 में यह तादाद 43.3 फीसदी रह गई।

समस्या इस वजह से भी है क्योंकि शिक्षण को अभी भी दूसरे दर्जे का काम माना जाता है। यानी लोग जब कोई काम करने में नाकाम रहते हैं तो वे शिक्षक बन जाते हैं। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति में जो भ्रष्टाचार है वह भी सरकारी शिक्षा के संकट का अहम बिंदु है। इन मुद्दों से शीघ्र निपटने की आवश्यकता है ताकि हम ऐसा देश न बन जाएं जहां उच्च प्रतिस्पर्धा वाले विश्व में अशिक्षित बच्चे बाहर निकलें।