संस्‍कृत शिक्षा : ऑनलाइन प्रयासों से दूर देववाणी

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संस्‍कृत शिक्षा : ऑनलाइन प्रयासों से दूर देववाणी

अजमेर : भारत की देववाणी कही जाने वाली प्राचीन संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के चाहे कितने वादे और इरादे किए गए हों लेकिन हकीकत में हालात एकदम उलट हैं। प्रदेश के गैर संस्कृत विद्यार्थियों की सहूलियत के लिए बड़ी शिक्षण संस्थाओं ने उनसे संबंधित सभी आंकड़े तो अपनी वेबसाइट पर ऑनलाइन डाल दिए हैं लेकिन प्रदेश के लाखों संस्कृत परीक्षार्थियों को इस सुविधा से पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है।

हालत यह है कि सरकारी नौकरी के लिए पात्र होने के बावजूद प्रमाण-पत्र सत्यापन (वेरिफिकेशन) के लिए संस्कृत भाषा से जुड़े अभ्यर्थियों को कई दिनों तक भटकना पड़ता है।

प्रदेश में जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा शास्त्री व आचार्य जैसी महत्वपूर्ण उपाधि परीक्षाओं सहित माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान की ओर से प्रवेशिका और वरिष्ठ उपाध्याय परीक्षाएं ली जाती हैं। इन परीक्षाओं को सैकंडरी से लेकर स्नातक उपाधि के समकक्ष माना जाता है।

2002 से अब तक नहीं डेटा उपलब्धबोर्ड परीक्षाओं में प्रति वर्ष लगभग 17 से 18 लाख विद्यार्थी शामिल होते हैं। इनमें संस्कृत भाषा में प्रवेशिका सहित वरिष्ठ उपाध्याय के परीक्षार्थी भी शामिल हैं। लेकिन बोर्ड का नजरिया संस्कृत भाषा के परीक्षार्थियों के प्रति कैसा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बोर्ड ने अपनी वेबसाइट पर दसवीं और बारहवीं के सभी विद्यार्थियों के डेटा वेबसाइट पर उपलब्ध करा दिए हैं लेकिन प्रवेशिका और वरिष्ठ उपाध्याय परीक्षा दे चुके परीक्षार्थियों का डेटा 2002 से ही उपलब्ध नहीं कराया गया है।

राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर के हाल भी इससे अलग नहीं हैं। इस विश्वविद्यालय में भी स्थापना के बाद से ही 2001 से अब तक लगभग चार लाख विद्यार्थियों के डेटा वेबसाइट पर अपलोड नहीं किए हैं।

नौकरी के समय आती है परेशानी

देश में आईटी क्रांति के बाद अधिकांश शिक्षण संस्थाओं ने अपने विद्यार्थियों के सभी डेटा ऑनलाइन उपलब्ध करा दिए हैं। नौकरी के समय संबंधित विभाग उनकी शैक्षणिक योग्यता को सत्यापित करने के लिए शिक्षण संस्थाओं की वेबसाइट पर रोल नंबर डालकर सारी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं।

संस्कृत परीक्षार्थियों के लिए सुविधा नहीं होने की वजह से उन्हें अपने प्रमाण-पत्र सत्यापित कराने के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर संस्कृत विश्वविद्यालय अथवा बोर्ड कार्यालय आना होता है। इस वजह से उनके समय के साथ आर्थिक नुकसान भी होता है।


फैक्ट फाइल

  • 20 हजार से अधिक परीक्षा देते हैं प्रति वर्ष शास्त्री व आचार्य परीक्षा
  • 4 हजार विद्यार्थी प्रति वर्ष देते हैं वरिष्ठ उपाध्याय परीक्षा
  • 8 हजार से अधिक विद्यार्थी देते हैं प्रवेशिका परीक्षा
  • 2002 के बाद से नहीं है ऑनलाइन डेटा
  • 4 लाख से अधिक है शास्त्री व आचार्य परीक्षार्थियों की संख्या
  • 2 लाख से अधिक दे चुके हैं प्रवेशिका व वरिष्ठ उपाध्याय परीक्षा

वरिष्ठ उपायाय और प्रवेशिका परीक्षा देने वाले सभी परीक्षार्थियों के डेटा ऑनलाइन डालने के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए जा रहे हैं। अन्य विद्यार्थियों की तरह संस्कृत विद्यार्थियों के लिए भी यह सुविधा जल्द प्रारंभ कर दी जाएगी।

-प्रो. बी. एल. चौधरी, अध्यक्ष माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड 

विद्यार्थियों के डेटा ऑनलाइन हैं या नहीं फिलहाल मुझे इसकी जानकारी नहीं है। अधिकारियों से मालूम करूंगा।

-प्रो. विनोद कुमार शर्मा, कुलपति, जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विवि जयपुर