शिक्षा पर करोड़ों की सद्भावना यात्रा का बोझ

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बीकानेर। शिक्षा राज्‍य की प्राथमिक जिम्‍मेदारियों में से एक है। ऐसे में शिक्षा पर किए जा रहे किसी भी खर्च को जितना अधिक समझदारी से किया जाए, परिणाम बेहतर होते जाएंगे। हाल के वर्षों में संचार क्रांति ने व्‍यवस्‍था के हर पहलु को चुस्‍त और अधिक कारगर बनाया है, लेकिन शिक्षा विभाग संचार और सूचना के सभी आधारभूत संसाधनों के बावजूद शिक्षा अधिकारियों और कर्मचारियों की सम्‍मुख प्रस्‍तुत होकर वार्ता करने की परंपरा विभाग पर करोड़ों रुपए का बोझ डालती है।

निदेशालय हर वर्ष करीब 11 करोड़ रुपए का भुगतान ऐसी यात्राओं के लिए करता है जो शिक्षा विभाग के अधिकारी और कर्मचारी करते हैं। इनमें से करीब 30 प्रतिशत यात्राएं ऐसी होती हैं, जिनमें विद्यालय निरीक्षण जैसे कार्य होते हैं, शेष सभी यात्राओं में अधिकांश कर्मचारियों के अधिकारियों से और अधिकारियों के अधिकारियों से मिलने की सद्भावना यात्राएं ही होती हैं।

पिछले दिनों कोरोना संकट ने यात्राओं के विकल्‍प के रूप में वीडियो कांफ्रेंसिंग को शिक्षा विभाग ने प्रभावशाली औजार के रूप में काम में लिया। विभाग के लगभग हर कार्यालय और सीनियर सैकण्‍डरी विद्यालय में इसके लिए आधारभूत सुविधाएं सालों से उपलब्‍ध हैं, लेकिन कोरोना संकट से पहले उन्‍हें उपयोग करना किसी को भी सूझा नहीं था।

पिछले दो महीने से अधिक समय से चल रही इन वीडियो कांफ्रेंसिंग के सफल प्रयास को देखते हुए शिक्षक संगठनों ने भी सरकार से मांग की है कि भविष्‍य में कर्मचारियों और अधिकारियों को सम्‍मुख मिलकर रिपोर्ट देने की कार्रवाई के बजाय वीडियो कांफ्रेंसिंग का ही इस्‍तेमाल किया जाए तो शिक्षा विभाग पर इन यात्राओं के कारण पड़ रहा करोड़ों रुपए का बोझ बहुत हद तक कम हो जाएगा।

राजस्‍थान प्राथमिक एवं माध्‍यमिक शिक्षक संघ के महामंत्री महेन्‍द्र पाण्‍डे ने RajasthanShiksha.Com से हुई बातचीत में बताया कि इस संदर्भ में पिछले दिनों राज्‍य सरकार के मुख्‍य सचिव को एक पत्र लिखकर इस संबंध में आग्रह भी किया गया है। इसमें उन्‍होंने कहा कि जिस प्रकार कोरोना काल में विभाग को हर बार यात्रा करने के बजाय वीडियो कांफ्रेंसिंग (वीसी) करने से लाखों रुपए के राजस्‍व की बचत हुई है। ऐसे में विभाग के पास पर्याप्‍त संसाधन होने के बावजूद यात्राओं को जारी रखना बेमानी होगा। भविष्‍य में ऐसी यात्राओं को समाप्‍त कर वीसी पर ही वार्ताओं को केन्द्रित किया जाए।

हर आदेश पर लाखों का खर्च

केवल यात्राएं ही नहीं, विभाग अभी तक आदेश की फिजिकल प्रतियों की भी उतनी ही परवाह करता है, ऐसे में जयपुर से पूरे राज्‍य के लिए जारी किए गए एक आदेश को अगर हर विद्यालय में लागू करना है, तो संबंधित संस्‍था उस आदेश का प्रिंट निकालकर रखती है। ऐसे हर आदेश की प्रति के लिए लाखों का खर्च कागजों पर होता है। इससे एक ओर राजस्‍व अथवा शिक्षकों का निजी खर्च होता है तथा पेड़ों का नुकसान भी। इसके बजाय अगर पेपरलैस आदेश और निर्देश राज्‍य द्वारा जारी किए जाएं और उन्‍हें बिना प्रिंट के ही सॉफ्ट कॉपी में मान्‍य किया जाए और आदेशों को डिजिटल हस्‍ताक्षर से जारी किया जाए, तो लाखों के कागजात की नियमित रूप से बचत हो सकती है।


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