प्रधानमंत्री ने छात्रों से कहा – टेक्नोलॉजी को अपने कब्जे में रखना जरूरी

Pariksha Pe Charcha 2020 Narendra Modi

इस पीढ़ी में जीवन टेक्नोलॉजी ड्रिवन हो गया है, इसका भय नहीं आने देना चाहिए. टेक्नोलॉजी को अपना दोस्त मानें, प्रोएक्टिव होना जरूरी है. मेरे लिए क्या उपयोगी है, ये जानना जरूरी है. स्मार्ट फोन आपका समय चोरी करता है लेकिन उसमें से कुछ समय करके अपने माता-पिता के साथ बैठिए. टेक्नोलॉजी को अपने कब्जे में रखना जरूरी है.रेलवे स्टेशन पर पूछताछ की विंडो होती है, लेकिन वहां पर बोर्ड भी लगा होता है. लेकिन लोग बोर्ड कम देखते हैं और पूछते ज्यादा हैं. लोग मैसेज करते हैं और फिर फोनकर करके पूछते हैं कि मेरा मैसेज मिला. नई पीढ़ी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सही करती है. अपनी मातृभाषा की डिक्शनरी को फोन में रखें और रोजाना कुछ वर्ड सीखें. आज के वक्त में सोशल नेटवर्किंग सिर्फ अपने फोन में आ गई है, पहले दोस्त को जन्मदिन विश करते हैं लेकिन अब रात को ही मैसेज किया जाता है. टेक्नोलॉजी का गुलाम नहीं बनना चाहिए.आज के वक्त में सोशल नेटवर्किंग सिर्फ अपने फोन में आ गई है, पहले दोस्त को जन्मदिन विश करते हैं लेकिन अब रात को ही मैसेज किया जाता है. हमें तय करना होगा कि रोजाना कुछ समय के लिए टेक्नोलॉजी फ्री रहूंगा. कुछ समय अपनों के साथ बिताना जरूरी हैं. घर में एक कमरा ऐसा होना चाहिए जिसमें टेक्नोलॉजी को नो एंट्री होगी, उस कमरे में जो भी आएगा बिना टेक्नोलॉजी आएगा.

यह बात प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज तालकटोरा स्‍टेडियम में परीक्षा से पूर्व छात्रों से बातचीत के कार्यक्रम परीक्षा पे चर्चा 2020 में कही।

अरुणाचल प्रदेश के एक छात्र का सवाल – देश के नागरिकों को अधिकारों और कर्तव्य को लेकर कैसे जागरुक बना सकते हैं. छात्रों के क्या अधिकार होते हैं?

PM मोदी: इस देश में अरुणाचल ऐसा प्रदेश है जो एक दूसरे से जब मिलते हैं तो जयहिंद करके मिलते हैं. ये देश के अलग हिस्सों में काफी कम होता है, 1962 की जंग के बाद अरुणाचल में ऐसा ही होता है. सिंगापुर-दुबई नहीं पहले अरुणाचल प्रदेश जाइए.

छात्रों के अधिकार और कर्तव्य में अंतर है, हमारे कर्तव्य में ही सभी के अधिकार समाहित हैं. अगर मैं शिक्षक के नाते अपना कर्तव्य निभाता हूं तो छात्रों के अधिकार की रक्षा होती है. अधिकार मूलभूत नहीं होते हैं, कर्तव्य मूलभूत होते हैं. अगर कर्तव्यों का पालन करें तो किसी को अपना अधिकार नहीं मानना पड़ेगा.

देश को राष्ट्र के रूप में कुछ कर्तव्य निभाने चाहिए, 2022 में आजादी के 75 साल हो रहे हैं, 2047 में जब आजादी के सौ साल होंगे तो आपको सोचना चाहिए कि आप कहां होंगे. अगर देश मजबूत होगा तो युवाओं के काम ही आएगा.
2022 में आजादी के 75 साल होंगे, आजादी के लिए लोगों जान की बाजी लगा दी थी, अंडमान निकोबार की जेल में जिंदगी गुजार दी थी. आजादी का मतलब झंडा बदले ये थोड़ी है, हम आत्मनिर्भर बनें. हमें खुद को कुछ लक्ष्य तय करने होंगे, परिवार को तय करना होगा कि हम देसी चीज़ें खरीदें. अगर क्रैकर भी बाहर से लाकर धमाका करेंगे तो क्या होगा? हम अपने घर का कूड़ा दूसरे के घर के सामने कह देते हैं.

आंध्रप्रदेश के छात्र का सवाल : परीक्षा में अध्यापक और माता-पिता के द्वारा बनाए गए दबाव से कैसे पार पाएं?
PM मोदी: जब बच्चा छोटा होता था तब मां-बाप उसको उत्साहित करते थे, लेकिन अब भी ऐसा ही होना चाहिए. बच्चों पर प्रेशर नहीं बनाना चाहिए, जिनके साथ बच्चे कम्फर्ट होता है उसे बात करना जरूरी है. भारत का हर बच्चा सुपर पॉलिटिशयन होता है, उसे पता है कि घर में किससे क्या काम करवाना है.


सोच ही जीत दिलाती है’
प्रधानमंत्री ने क्रिकेट मैच का उदाहरण देते हुए समझाया, ‘‘2001 में भारत-ऑस्ट्रेलिया का क्रिकेट मैच था। सारा माहौल डिमोटिवेशन का था। लेकिन राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण ने ऐसा खेले कि परिस्थिति को उलट दिया। उन्होंने मैच जीत लिया। जूझ जाएं तो नतीजा बदल सकता है। 2002 में वेस्टइंडीज के साथ मैच में अनिल कुंबले को जबड़े में गेंद लग गई। हम सोच रहे थे कि अनिल बॉलिंग कर पाएंगे या नहीं। अगर वे न भी खेलते तो देश उन्हें दोष न देता, लेकिन वे पट्टी लगाकर मैदान पर उतरे। उस समय ब्रायन लारा का विकेट लेना बड़ा काम माना जाता था। उन्होंने लारा का विकेट लेकर पूरा मैच पलट दिया। यानी एक व्यक्ति की हिम्मत से परिस्थितियां कैसे बदल सकती हैं। एक आदमी का संकल्प कइयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है।’’


नंबरों का चक्कर छोड़ें’
‘‘आज जाने-अनजाने सफलता-विफलताओं का पैमाना परीक्षाओं के मार्क्स बन गए है। इस वजह से छात्र सोचते हैं, कि बाकी सब पीछे छोड़े पहले नंबर ले आऊं। माता-पिता अपने बच्चों से 10वीं-12वीं में अच्छे नंबर लाने, इसके बाद कोई एंट्रेंस निकालने का कहते हैं। अब दुनिया बदल गई है। एग्जामिनेशन जिंदगी नहीं, सिर्फ एक पड़ाव है। मैं पेरेंट्स से कहना चाहता हूं कि बच्चों को यह मत कहें कि ऐसा नहीं हुआ तो दुनिया लुट गई। बच्चे किसी भी क्षेत्र में जा सकते हैं। हो सकता है स्कूल में कम नंबर आएं, लेकिन बच्चे कुछ और नई चीजें सीखकर जीवन को बेहतर बना सकते हैं।’’


तकनीक को हिसाब से इस्तेमाल करें’
‘‘इस वक्त टेक्नोलॉजी का जोर है, लेकिन कोशिश होनी चाहिए कि उसका बेहतर इस्तेमाल कैसे हो। जितना समय आपका स्मार्टफोन खाता है, उसका 10% भी माता-पिता के साथ बिताएं तो किसमें ज्यादा फायदा होगा। हमारे अंदर वह ताकत होनी चाहिए कि तकनीक को अपने हिसाब से इस्तेमाल करूंगा। आज की पीढ़ी स्टेशन पर ट्रेन देखने के लिए लाइन नहीं लगाती। वे गूगल डुओ से बात कर लेते हैं, घर बैठकर की ट्रेन के बारे में जानकारियां हासिल कर लेते हैं। यानी तकनीक का प्रयोग कैसे हो यह नई जेनरेशन जान गई है। टेक्नोलॉजी का ज्यादा इस्तेमाल हो, लेकिन गुलाम न बनें।’’


बच्चे की क्षमता आंकें
‘‘पेरेंट्स-टीचर्स को अंदाजा होना चाहिए कि स्टूडेंट्स की क्षमता क्या है। पेरेंट्स सोचें कि जब आप तीन-चार साल के थे, तब आपके मां-बाप कैसे बर्ताव करते थे। बच्चे बड़े हो गए हैं यह स्वीकारें, लेकिन खुद को उनकी मदद करने वाली साइकी में ही रखिए। भारत में बच्चा सुपर पॉलिटिशियन होता है। उसे पता है कि पापा फिल्म देखने के लिए मना करेंगे, तो वह दादी के पास जाता है। मां कुछ मना करती है तो वह पापा के पास जाता है। बच्चों को जितना प्रोत्साहित करेंगे, उतना बच्चे को शक्ति पता चलेगी। जितना दबाव डालेंगे, उतना ही वह परेशान होगा।’’


जब बेहतर लगे, तब पढ़ें
‘‘पढ़ने के लिए रात को जागें या सुबह, यह बड़ा मुद्दा है। मैं इस पर बात करने के लिए 50% ही अधिकारी हूं क्योंकि मैं सुबह जल्दी तो उठता हूं, लेकिन रात में जल्दी सो नहीं पाता। लिहाजा, मैं मॉरल अथॉरिटी नहीं हूं, जो आपको इस बारे में बताऊं। फिर भी सोचिए कि पूरे दिन मेहनत के बाद आपके पास कितनी क्षमताएं बचेंगी, रात में पढ़ते वक्त आपका दिमाग प्रीऑक्यूपाइड होगा। हो सकता है रात में आप फोकस न कर पाएं। लेकिन गहरी नींद के बाद सुबह सूर्योदय के पहले तैयार होकर पढ़ना शुरू करते हैं तो आप मन से तंदुरुस्त होते हैं। उस समय जो आप पढ़ेंगे वो ज्यादा रजिस्टर होगा। जरूरी यह नहीं कि सुबह पढ़ना है या शाम को। आप जिसमें कंफर्टेबल हों, वही करें।’’


देखादेखी नहीं, मन का काम करें
‘‘जीवन में हर किसी को कुछ न कुछ जिम्मेदारियां निभानी होती हैं। अगर आप किसी की देखादेखी में कोई काम करते हैं, तो बहुत निराशा हाथ लगेगी। अगर अपने मन का काम करेंगे, तो मजा आएगा। जिंदगी में अगर एकाध एंट्रेंस में रह गए तो क्या। लाखों लोग पीछे रह जाते हैं। लेकिन अगर हम डर के कारण कदम ही न रखें तो उससे बुरा कुछ नहीं। हमेशा अपने अंदर के विद्यार्थी को जीवित रखें। जीवन जीने का यही मार्ग है, नया-नया जानना।’’


30-40 साल बाद गर्व होगा
‘‘आज जो मेरे सामने बैठे हैं, वो नया भारत हैं। 2047 में भारत जब आजादी की शताब्दी मनाएगा, तो आपके पास नेतृत्व होगा। आज से 30-40 साल बाद जब सफलता को चूमेंगे और मैं अगर जीवित रहूंगा तो गर्व से कहूंगा कि यह वही लोग हैं, जिनका मुझे 20 जनवरी को दर्शन करने का सौभाग्य मिला था। मैं गर्व करूंगा कि जब आपके हाथ में देश का नेतृत्व होगा। संतोष होगा कि इनसे मैंने बात की थी। परीक्षा जिंदगी नहीं है, परीक्षा जिंदगी में महज एक मुकाम है। आप में से बहुत से लोग हैं, जिन्हें शायद यहां मौका नहीं मिला। मैं उनसे क्षमा चाहता हूं।’’


इस दौरान पीएम ने शिक्षकों और अभिभावकों से भी संवाद किया. इस कार्यक्रम का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि छात्र तनावमुक्त होकर आगामी बोर्ड एवं प्रवेश परीक्षाएं दें. दिल्ली के तालकटोरा इनडोर स्टेडियम में आयोजित किए गए ‘परीक्षा पे चर्चा’ के तीसरे सत्र में पीएम मोदी ने छात्रों और शिक्षकों से परीक्षा के तनाव को दूर करने पर संवाद किया. इस कार्यक्रम में करीब 2,000 छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों ने भाग लिया. इनमें से 1,050 छात्रों का चयन निबंध प्रतियोगिता के जरिए किया गया था. कार्यक्रम सोमवार दोपहर 11 बजे शुरू हुआ था और बीजेपी के ‘यूट्यूब’ (YouTube) चैनल पर भी इसका सीधा प्रसारण किया गया था. ‘परीक्षा पे चर्चा’ के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उन छात्रों का चयन किया, जिन्होंने पांच विषयों पर उनके द्वारा दिए गए निबंधों को सही रूप से प्रस्तुत किया.