Shala Darpan (शाला दर्पण) – शिक्षकों की पीड़ा

Shala Darpan ka Server Down hai | शाला दर्पण का सर्वर डाउन हैं।
Shala Darpan ka Server Down hai | शाला दर्पण का सर्वर डाउन हैं।

Shala Darpan (शाला दर्पण) – शिक्षकों की पीड़ा

शिक्षण प्रबंधन तंत्र को पूरी तरह ऑनलाइन बनाने की गरज से शाला दर्पण के जरिए व्यवस्था तो बना दी गयी है, लेकिन इसे चलाने के लिए जो प्रशासनिक इच्छाशक्ति चाहिए उसका अभाव अब शिक्षकों को पीड़ित करने लगा है। ऐसे ही एक शिक्षक ने शाला दर्पण की दुरावस्था पर करारा व्यंग्य लिखा है, जो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा है।


शाला दर्पण: एक आफत (क्यों की सर्वर डाउन है)

मेरे जीवन में शाला दर्पण से बड़ी पीड़ा कोई नहीं। अब तो ये हाल है कि किसी ज्योतिषी को हाथ दिखाता हूँ तो ज्योतिषी भी हथेली को घूरकर डराने वाली आंखों से बोलता है- बच्चा तेरे जीवन में बड़ा संकट है। मैं उनके चरण पकड़ लेता हूँ कि बाबाजी आप अंतर्यामी है, आपने ठीक पहचान लिया। उस संकट का नाम शाला दर्पण ही है। बाबाजी को खूब दक्षिणा दी लेकिन संकट टलता ही नहीं। बाबाजी बोले तेरा शनि भारी है, पर मुझे तो मेरे शनि, मंगल, राहु, केतु सारे ग्रह शाला दर्पण ही लगते हैं।

मैं जब टीनएज में था तो मेरी कोई प्रेमिका नहीं होने के बावजूद गम भरें गाने, बेवफाई वाले गीत मुझे बड़े पसंद थे। खासकर अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का, यार ही ने लूट लिया घर यार का… वाला गाना,

पर अब मेरा अनुभव पूछो तो सबसे बड़ा बेवफा ये शाला दर्पण ही है। जब 4 बालक सामने खड़े हो TC लेने के लिए, जब कोई महत्वपूर्ण काम करना हो, शाला दर्पण उस क्रिटिकल टाइम पर ही धोखा देता है। साइट गायब हो जाती है। बचपन में कहानी सुनी थी, दो दोस्त जंगल में, भालू आया और एक दोस्त दूसरे को छोड़कर पेड़ पर चढ़ गया। ये भाग जाने वाला दोस्त शाला दर्पण ही है। आप 10 मिनट तक कोई फीडिंग करते रहो, टप टप टप टाइपिंग चलाते रहो, जैसे ही सेव वाला क्लिक करो, साइट गायब, एरर, और सारी फीडिंग और मेहनत फुर्रर्रर्र। आपके पास में जॉइनिंग करवाने या रिजल्ट /स्कॉलरशिप / किताब या कोई भी फीडिंग करवाने के लिए कार्मिक बैठा है, साइट एरर आने पर वो कर्मचारी शाला दर्पण प्रभारी को यूं घूरकर देखता है मानों सारी गलती प्रभारी की है। मैं तो जब भी फीड कर रहा होता हूँ तो मन ही मन कोई मंत्र पढ़कर ऊपर वाले को याद करता रहता हूँ कि डेटा सेव हो जाये और साइट न गायब हो।

हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता, शाला दर्पण से जुड़ी पीडाएं और दुख भी अनन्त है। जैसे नया प्रवेश फॉर्म आएगा तो भरने वाले महान लोग बालक का नाम हिंदी में भर देंगे, अब शाला दर्पण प्रभारी पीछे के कागजों में जूझता रहे, बालक की TC में नाम कुछ और, मार्कशीट में कुछ और, जन्मप्रमाण पत्र में कुछ और। अध्यापकों को अपना सिरदर्द कम रखना है और सारी टेंशन शाला दर्पण प्रभारी की, फॉर्म में न मोबाइल, न घर और स्कूल की दूरी, न माता पिता के व्यवसाय शिक्षा की जानकारी, सब चीज शाला दर्पण प्रभारी जाने और उसका काम जाने, हमें क्या लेना देना? स्कॉलरशिप भरो तो स्कूल रिकॉर्ड में बालिका का नाम निकिता, जनाधार में उर्मिला, शाला दर्पण प्रभारी ही सब चीज का हिसाब रखे।

अब इन समस्याओं से तो तब निबटें जब शाला दर्पण चले, कभी कभी तो अंगद के पांव जैसा ऐसा टिक जाता है कि जरा सा भी आगे नहीं खिसकता। आदमी बस बैठा बैठा गुनगुनाता रहे, चल चल री चल री मेरी राम प्यारी, रब ने बना दी जोड़ी हमारी। कई बार तो क्लिक करने पर नीला नीला चकरा घूमता रहता है और लिखा रहता है loading…मैं बाहर जाकर चाय पी आता हूँ, या टॉयलेट हो आता हूँ पर घुमयो रे घुमयो रे..इला अरुण वाले गाने की तरह स्क्रीन पर गोलाकार घूमता रहता है। सुबह 8 बजे किसी बन्दे ने लॉगिन किया तो शाला दर्पण का मूड ठीक रहता है, फिर आगे 9 फिर 10 फिर 11 बजते बजते एक्सप्रेस से पैसेंजर फिर लोकल फिर मालगाड़ी और फिर बैलगाड़ी वाली रफ्तार पर आ जाता है। उसके बाद तो कंप्यूटर छोड़कर मोबाइल उठाओ और ग्रुप ग्रुप में भेजो, पूछो – शाला दर्पण चल रहा है क्या? राजस्थान के सारे जिलों से तस्दीक हो जाती है, फिर भी सवाल जारी रहते हैं क्योंकि काम लटके रहते हैं। स्कूल में बाकी लोग कुर्सियों पर उँघते रहते है और शाला दर्पण प्रभारी लोग शाला दर्पण से जूझते रहते हैं। रोज एक नया मॉड्यूल जोड़ दिया जाता है लेकिन शाला दर्पण की स्पीड रोज घटती जा रही है।

हमारा देश तो वैज्ञानिको का देश है, नाले के गैस से चाय बन रही है, टरबाइन से ऑक्सीजन और पानी मिल रहा है तो फिर शाला दर्पण ठीक क्यों नहीं हो सकता? जहां इसका सर्वर है वहां पर किसी तांत्रिक को ले जाकर टोना टोटका करवाया जाए पर प्रभारियों को तो न तपाया जाए। ये जन्म तो व्यर्थ कर दिया शाला दर्पण ने। मेरा तो खुला ऑफर है, स्कूल में 15 आदमियों के सारे चार्ज एक अकेले मुझे दे दो, लेकिन शाला दर्पण ले लो जी। अगले जन्म में पकोड़ा बेचूँगा या पान की दुकान खोल लूंगा पर शाला दर्पण नहीं प्रभु ।


एक पीड़ित शिक्षक